मैं मेरी आवाज़ में आपसे इस वीडियो में रु-ब़-रु होऊँगा..
Hi friends............! WO PALL...is the name of a book in Hindi literature by which you can touch the horizon of self motivation and human values indeed....Readers just wait for the upcoming English Novel"The Story of WEEKENDS." yours - Sarvesh Tripathi 'kavya'.
Saturday, October 29, 2011
वो पल की चित्र-कथा एक कॉकटेल से वीडियो मे.
मैं मेरी आवाज़ में आपसे इस वीडियो में रु-ब़-रु होऊँगा..
Monday, August 30, 2010
Monday, February 1, 2010
Tuesday, January 5, 2010
janwari ki sardi....
इक चादर में कुकड़े बैठे ,
हाथों में हाथ लिए सजन का.
वो सर्द रात की सर्द चांदनी,
श्वेत कुहासे को छू कर,
श्वेत श्वेत सी दुधिया फैली,
खुद जैसी बाहों में ले कर.
सफ़ेद चादर की ओढ़नी में,
धरती दामन थामे बैठी,
घूँघट के अन्दर फसलों सी,
मुस्काए सूरत पे बैठी.
शरद ऋतू ये शांत ऋतु,
स्नेह की ज्वाला क्रांत ऋतु,
चादर के दरम्यान भी अपने,
चंचल चपल और कान्त ऋतु.
सांसों की सांसों से गर्मी,
रातों की रातों से शर्मी,
मधुर मिलन और वृन्द अगन,
स्पर्शों से स्पर्शों की नर्मी.
Sunday, July 26, 2009
कितने वीरानों से गुज़रे हैं तो जन्नत पाई है....
इससे जुडा एक बड़ा तजुर्बा आपसे बाँटना चाहूँगा.... बात उस वक्त की है जब मैं अपनी रचनाएँ ले कर दिल्ली के एक बड़े प्रकाशक के यहाँ पंहुचा हुआ था, वहीँ एक समृद्ध लेखक बन्धु भी मौजूद थे। प्रकाशक बाज़ार की अस्थिरता को देखते हुए पुस्तक में पैसा लगाने को राजी नही हो रहे थे। तभी लेखक बन्धु जो मुझसे करीब तिगुनी उम्र के थे, मुझे समझाते हुए कहा था-"ऐसा है! तुम क्यों पुस्तक प्रकाशित कराने के चक्कर में लगे हो? बहुत कठिन प्रक्रिया है,बहुत पैसा लगाना पड़ता है, जूते तक घिस जाते हैं।"
थोडी देर भूमिका बांधने के बाद वे बोले- "एक काम करो ढाई-तीन लाख ले लो और भूल जाओ की तुम्हारे पास कुछ था। "मैं बहुत हैरान हुआ की सालों की तपस्या का यही नतीजा था! अपने आप को कुछ साबित करने की
जद्दो-जेहद में जुटे एक इंसान को दुनिया किस कदर नीचा दिखा सकती है, ये लेखक के लगाए हुए कौडियों के मोल से स्पस्ट हो गया।
ख़ुद अकेले बिना किसी अनुभव के ये सब कुछ करने निकल पड़ना मुझे जीवन का कितना बड़ा अनुभव दे गया। बिना सोचे किंतु एक प्रखर मुद्रा में मैंने उनको ज़वाब दिया-" मैं फिलहाल एक छात्र हूँ, जो थोडी बहुत आवश्यकताएं होती हैं वो घरवाले पूरा कर देते हैं। अभी मुझे पैसे की भूख नही है, भूख तो किसी और ही चीज़ की है। वो भूख मुझे मिटा लेने दीजिये।
और आज इस मंच से संबोधित करते हुए बड़े रोआब में कह सकता हूँ की जिस चीज़ की भूख थी मुझे, उसे अपने जबड़ों के बीच रख कर बड़े शान से चबा रहा हूँ। ऐसा कहने में मुझे ज़रा भी संकोच नही है.... ।
Friday, July 17, 2009
वो पल...
वो यादें न जाएंगी,
यूँ दिन न बीतेगा,
अब रातें न जाएंगी।
हम पलकों के झरोखे से,
बस देखते ही रह जाएँगे,
तुम चुपके कदम चले जाओगे,
ये नयन गीले रह जाएँगे।
यूँ आस का दामन थामे बैठा,
पर दर्श ना आँखें पाएंगी,
काँलेज के ये दिन बीतेंगे,
यादें ही जवा रह जाएंगी।
कल कौन हमें अब याद करेगा,
क्यूँ कोई फरियाद करेगा,
जब हम ही न होंगे इस बगिया में,
फूलों की कहानी कौन कहेगा।
अब वक्त रहा ना चार भी हमपे,
बस कर के कुछ यूँ गुज़र जाएँगे,
दो - चार हसरतें पूरी कर लें,
फ़िर आप ही हम थम जाएँगे।
चाहे - अनचाहे लोग मिलेंगे,
दो टूक न कोई बात कहेगा,
जाते - जाते दुनिया से ये बुत,
इक लफ्ज़ में बस अल्लाह कहेगा।
Tuesday, February 10, 2009
वो पल...

"वो पल..." आप सोचेंगे कौन से पल! ये वो पल हैं जिनसे जीवन में हर शख्स को रु-ब-रु होना होता है.....
यहाँ उन संवेदनशील लम्हों की बात कही जा रही है जो अपने आप में कई तरह की मनोभावनाएं समेटे हुए हैं... और जिनके बिना ये जीवन अधुरा है। निश्चित ही हर वाकया, हर काव्यांश आपकी अपनी ही दास्ताँ है।
प्रत्येक कविता एवं वाक्यांश अपना कुछ वजूद रखती है। कुछ घटनाएँ, कोई व्यक्तित्व, कुछ आतंरिक संवेदनाएं, कुछ विचार, सजीव एवं निर्जीव मनोविज्ञान, संभवतः कोई करुण अथवा खुशनुमा दृश्य जो जब मेरे आस पास-आए या किसी और को इनमें उलझा देखा , तभी मैंने इन्हे उठा कर कागज़ के पन्नों पर सज़ा दिया और उकेर दिया उन सभी अहसासों और दृष्टिकोणों को जो की मन मस्तिष्क को झकझोर देने की छमता रखता थे।
तो आइये काव्य-साहित्य को उसकी विभिन्न परम्पराओं में महसूस करें। विभिन्न रसों से लाबलाब्ब इस रस-शाला "वो पल" का द्वार आप सबके लिया खुला है और मैं इस बाग़ का माली (सर्वेश त्रिपाठी) दोनों हाथों से आपका स्वागत एवं आह्वान करता हूँ।
एक इंजीनियरिंग छात्र के तौर पर मेरा मानना है कि तकनीक का प्रयोग भाषा एवं साहित्य के स्तर पर भी होना चाहिए,ताकि साहित्य कि ये विधा अपने तकनिकी रूप में सुशोभित हो सके । फलतः किसी भी कार्य के तकनिकी पहलुओं को ध्यान में रख कर ही सटीकता को प्राप्त किया जा सकता है।
आपका - सर्वेश त्रिपाठी"काव्य".
Wednesday, August 27, 2008
पुराने पन्ने.

आज अचानक हाथ लगे,
तासीर आज भी ताजी थी,
बचपन में लिखे उन गीतों की,
गलतियाँ बड़ी निकली उनमें,
स्वाद और भी पाया उनमें।
तब के ख़ुद पर इतना ,
ज़ोर ज़ोर से हसना आया,
ख़ुद की गलती का सुधारक,
एक उम्र बाद जो बन आया,
नन्हे मन की परख भी देखी,
भींगी आँखें नही थी सूखी।
उल्लास पूरित मन एक पाया,
जब मैंने वो गाना गाया,
सुर उसके आज भी याद थे,
हाथों ने बरबस ताल भी ठोका,
महफ़िल सजी बिन लोगों के,
ख़ुद को कौन है देता धोखा।
विषय बड़ा दिलचस्प था निकला,
भूत में जिसने मुझको धकेला,
परत डर परत उधेरती गई,
छोटी छोटी यादों की कलि,
आदे तिरछे लिखा था सब कुछ,
हाँ! लिखावट पहले से सुधर गई.
Monday, June 23, 2008
वजूद.

ठौर ठिकाना पता न जिसका,
किस डगर पर,किस मंजिल का,
इस गर्दिश में अश्क है किसका।
हूँ किस किस की सोच,
कहाँ मेरा साया है जाता,
मैं औरों को कहा जानू,
ख़ुद को भी कैसे पाता?
दूर कहाँ देखा करता हूँ,
कौन वहाँ दिखता है मुझको,
वजूद बयां भी है क्या उसका,
क्यूँ धुंधला सा दिखता मुझको?
राह कठिन है दूर चला चल,
क्यूँ थक सा तू जाता है,
मंजिल भी पीछे दौड़ पड़ेगी,
देखें कब रहें नई बनाता है?
बचपन मत छीनो

ए वक्त!मुझसे मेरा बचपन मत छीनो।
फ़िर दिन का उजाला भर जाए,
सुना आँगन फ़िर खिलखिलाए,
बगिया अपनों से सजती हो तो,
जीने का मज़ा भी आ जाए।
यूँ रात का आँचल गहराए,
सो शाम की लाली खोने दो।
ए वक्त!मुझसे मेरा बचपन मत छीनो।
ए वक्त!मुझसे मेरा बचपन मत छीनो।
प्रथम गुरु जो माँ है मेरी,
जिसने मुझे चल संसार दिखाया,
उसके आँचल में आनंद लहर थी,
सत संस्कारों से लैस कराया,
वही आदि है,वही अंत है,
फ़िर उसी गुरु संग पढने दो।
ए वक्त!मुझसे मेरा बचपन मत छीनो।
बिता बचपन,बदली कया,
जाने कहा समय ले आया,
नए रही जब साथ मिले,
नई नवेली बात बढ़ी,
बातों की सौगात बढ़ी,
बातों की काया बदल न दो।
ए वक्त!मुझसे मेरा बचपन मत छीनो।
