Saturday, October 29, 2011

वो पल की चित्र-कथा एक कॉकटेल से वीडियो मे.

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मैं मेरी आवाज़ में आपसे इस वीडियो में रु-ब़-रु होऊँगा..



Monday, August 30, 2010

मनाली की एक शाम....


                       ...दोस्तों के साथ वक़्त बिताये एक ज़माना हो गया था.... हैदराबाद से दिल्ली फिर वहाँ से अपने प्रोजेक्ट वर्क को निपटा कर हम कुल्लू मनाली की ओर निकल पड़े.... पहाड़ों से मेरा बहुत लगाव रहा है और अपने इंजीनियरिंग के दौरान मेरे समय का एक बड़ा हिस्सा इन्ही हिमालय की वादियों में गुज़रा. अपने प्रकृति प्रेम का आगाज़ करने हम फिर से निकल पड़े थे....चंडीगढ़ फिर शिमला बाई पास फिर कुल्लू और मनाली और उसके आगे रोहतांग का दुर्गम रास्ता जो सीधे भारत-चीन सीमा तक पहुचता है..वो सौंधी सौंधी खुशबू फिर से मेरे ज़ेहन को झकझोरने लगी थी.... जी तो किया की इन्ही वादियों में बैठ कर कोई ग़ज़ल लिखी जाये पर और दोस्तों को बोर नहीं करना चाहता था. सो हमने मनाली पहुच कर एक कॉटेज इन्ही वादियों के बीच ले लिया और फिर यहाँ की खूबसूरती को निहारने निकल पड़े.

                        गोरे लोग, छोटी छोटी आँखें, शरीर गठीला पर कद काठी उतनी  ही छोटी, अलग बोली, विशाल हिमालय, दिल दहला देने वाली उचाइयां और दर्दनाक खाइयाँ, चोटियों पर फसे हिम के अंश, आसमान को चढ़ते रास्ते, अल्हड़ नदियाँ, सेव के बाग़, बड़े दिल वाले लोग, पहाड़ कि ढालों पर घूमते मवेशी और सर्पनुमा रास्ते अपनी दास्ताँ खुद ही बयां कर रहे थे.... जब घर की छतों को छूते बादल कभी कभी कमरे की खिड़की से अन्दर की तरफ  झाँकने लगते तो दिल अपने आप बोल उठता कि यही स्वर्ग  है....

अगली सुबह हम रोहतांग कि तरफ निकल चले....बर्फीले रास्तों की वज़ह से गाड़ी की टायरों में ग्रिप चेन बंधवानी पड़ी ताकि बर्फ पर वो फिसले नहीं....वहाँ पहुचते ही पारा ग्लाइडिंग, स्कीइंग, फाइरिंग और माउन्टेन रोवर की ड्राइव का लुफ्त उठाया....बर्फ की एक सफ़ेद चादर ओढ़े वो पहाड़ियां किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थीं.. 

कुल मिला कर समय बड़ा खुशनुमा बीता और मैं इन वादियों की कशिश अपने ज़ेहन में लिए वापस हैदराबाद आ गया..लेकिन पुनः जब भी वक़्त मिलेगा ये मन तो  इनकी ओर ही निकलना चाहेगा ....

Monday, February 1, 2010

मुंबई मेरी जान....

पिछले हफ्ते मैं मुंबई के ट्रिप पर जा पहुचा, कुछ काम था.... पर मुंबई को नज़दीक से छूने का मौका कुछ यूँ मिला कि बयाँ करूँ तो शायद शब्द कम पड़ने लगें.... अपने सफ़र के दौरान छत्रपति शिवाजी टर्मिनल से गुजरा तो पाया सब कुछ रोज़ मर्रा कि तरह बीत रहा था. वो पुराना स्टेशन जो दशकों से मुंबई कि पहचान रहा है आज भी अपनी कशिश लिए खड़ा था. जीव और जीवन कि रफ़्तार यहाँ थमने का नाम नहीं लेती.... काम से समय निकाल कर मैं होटल ताज कि गलियारे से गुज़रा तो पाया कि मुंबई पिछले साल के आतंकी हमलों के सदमे से उबरी नहीं थी. वो आज भी अपने अस्तित्व  की लड़ाई लड़ रही थी, दीवारों पे दगे गोलियों के निशाँ अभी मिट भी नहीं पाए थे.... एक अंतहीन रंगों रोगन का काम चल रहा था जो इस वाकये को उसके ज़ेहन से कतई मिटा ही नहीं पा रहा था.... दूसरी तरफ खड़ा गेट-वे ऑफ़ इंडिया उसका ढाढस बढ़ाता हुआ सा दिखा.. शायद उसपर गोलियां कुछ कम चली थीं.  लेकिन आज भी ये रुदन दृश्य देखने लोगों का मज़मा लगा था और लगता ही रहेगा, न तो किसी को उनकी पीड़ा का एहसास है और न ही समझने की इक्षा....

कुल  बात ये है..आम बात ये है कि हम सबको उनकी संवेदना का आभास नहीं है.. आज भी ये राष्ट्रिय धरोहर अपना न्याय ढूंढ़ रहे हैं.... और दूसरी ओर इसकी आड़ में अन्तर्रष्ट्रीय राजनीति कि रोटियां सेकी जा रही हैं.

सीधा सवाल ये है कि आतंकी अजमल कसाब अबतक जिंदा क्यूँ है.. आज मेरी कलम डगमगा रही है और आखिर ये इतनी हिंसक कैसे हो सकती है.. देशहित में आज ये भी सही.... मेरी आवाज़ अगर कही तक पहुँच  रही है तो सरे आम उस दुस्वप्न का अंत कर न्याय प्रथा को आगे बढाने कि पहल हो.... न कि किसी अगले कंधार हाइजैक का इंतज़ार..!

Tuesday, January 5, 2010

janwari ki sardi....



जनवरी की वो श्वेत सर्दी,
और सफ़र जो ताज महल का,
इक चादर में कुकड़े बैठे ,
हाथों में हाथ लिए सजन का.

वो सर्द रात की सर्द चांदनी,
श्वेत कुहासे को छू कर,
श्वेत श्वेत सी दुधिया फैली,
खुद जैसी बाहों में ले कर.

सफ़ेद चादर की ओढ़नी में,
धरती दामन थामे बैठी,
घूँघट के अन्दर फसलों सी,
मुस्काए सूरत पे बैठी.

शरद ऋतू ये शांत ऋतु,
स्नेह की ज्वाला क्रांत ऋतु,
चादर के दरम्यान भी अपने,
चंचल चपल और कान्त ऋतु.

सांसों की सांसों से गर्मी,
रातों की रातों से शर्मी,
मधुर मिलन और वृन्द अगन,
स्पर्शों से स्पर्शों की नर्मी.

Sunday, July 26, 2009

कितने वीरानों से गुज़रे हैं तो जन्नत पाई है....


कुल पांच साल पहले देखा हुआ एक सपना तब पूरा हुआ जब मेरी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई, उसकी पहली प्रति मेरे हाथों में आई और फ़िर उसका विमोचन कॉलेज कैम्पस में संपन्न हुआ....सपना ही था शायद.. पर इसके पीछे मेरी एक लम्बी तपस्या शामिल थी ।

इससे जुडा एक बड़ा तजुर्बा आपसे बाँटना चाहूँगा.... बात उस वक्त की है जब मैं अपनी रचनाएँ ले कर दिल्ली के एक बड़े प्रकाशक के यहाँ पंहुचा हुआ था, वहीँ एक समृद्ध लेखक बन्धु भी मौजूद थे। प्रकाशक बाज़ार की अस्थिरता को देखते हुए पुस्तक में पैसा लगाने को राजी नही हो रहे थे। तभी लेखक बन्धु जो मुझसे करीब तिगुनी उम्र के थे, मुझे समझाते हुए कहा था-"ऐसा है! तुम क्यों पुस्तक प्रकाशित कराने के चक्कर में लगे हो? बहुत कठिन प्रक्रिया है,बहुत पैसा लगाना पड़ता है, जूते तक घिस जाते हैं।"

थोडी देर भूमिका बांधने के बाद वे बोले- "एक काम करो ढाई-तीन लाख ले लो और भूल जाओ की तुम्हारे पास कुछ था। "मैं बहुत हैरान हुआ की सालों की तपस्या का यही नतीजा था! अपने आप को कुछ साबित करने की
जद्दो-जेहद में जुटे एक इंसान को दुनिया किस कदर नीचा दिखा सकती है, ये लेखक के लगाए हुए कौडियों के मोल से स्पस्ट हो गया।

ख़ुद अकेले बिना किसी अनुभव के ये सब कुछ करने निकल पड़ना मुझे जीवन का कितना बड़ा अनुभव दे गया। बिना सोचे किंतु एक प्रखर मुद्रा में मैंने उनको ज़वाब दिया-" मैं फिलहाल एक छात्र हूँ, जो थोडी बहुत आवश्यकताएं होती हैं वो घरवाले पूरा कर देते हैं। अभी मुझे पैसे की भूख नही है, भूख तो किसी और ही चीज़ की है। वो भूख मुझे मिटा लेने दीजिये।

और आज इस मंच से संबोधित करते हुए बड़े रोआब में कह सकता हूँ की जिस चीज़ की भूख थी मुझे, उसे अपने जबड़ों के बीच रख कर बड़े शान से चबा रहा हूँ। ऐसा कहने में मुझे ज़रा भी संकोच नही है.... ।

Friday, July 17, 2009

वो पल...


वो पल न भूलेंगे ,
वो यादें न जाएंगी,
यूँ दिन न बीतेगा,
अब रातें न जाएंगी।

हम पलकों के झरोखे से,
बस देखते ही रह जाएँगे,
तुम चुपके कदम चले जाओगे,
ये नयन गीले रह जाएँगे।

यूँ आस का दामन थामे बैठा,
पर दर्श ना आँखें पाएंगी,
काँलेज के ये दिन बीतेंगे,
यादें ही जवा रह जाएंगी।

कल कौन हमें अब याद करेगा,
क्यूँ कोई फरियाद करेगा,
जब हम ही न होंगे इस बगिया में,
फूलों की कहानी कौन कहेगा।

अब वक्त रहा ना चार भी हमपे,
बस कर के कुछ यूँ गुज़र जाएँगे,
दो - चार हसरतें पूरी कर लें,
फ़िर आप ही हम थम जाएँगे।

चाहे - अनचाहे लोग मिलेंगे,
दो टूक न कोई बात कहेगा,
जाते - जाते दुनिया से ये बुत,
इक लफ्ज़ में बस अल्लाह कहेगा।

Tuesday, February 10, 2009

वो पल...


"वो पल..." आप सोचेंगे कौन से पल! ये वो पल हैं जिनसे जीवन में हर शख्स को रु-ब-रु होना होता है.....
यहाँ उन संवेदनशील लम्हों की बात कही जा रही है जो अपने आप में कई तरह की मनोभावनाएं समेटे हुए हैं... और जिनके बिना ये जीवन अधुरा है। निश्चित ही हर वाकया, हर काव्यांश आपकी अपनी ही दास्ताँ है।
प्रत्येक कविता एवं वाक्यांश अपना कुछ वजूद रखती है। कुछ घटनाएँ, कोई व्यक्तित्व, कुछ आतंरिक संवेदनाएं, कुछ विचार, सजीव एवं निर्जीव मनोविज्ञान, संभवतः कोई करुण अथवा खुशनुमा दृश्य जो जब मेरे आस पास-आए या किसी और को इनमें उलझा देखा , तभी मैंने इन्हे उठा कर कागज़ के पन्नों पर सज़ा दिया और उकेर दिया उन सभी अहसासों और दृष्टिकोणों को जो की मन मस्तिष्क को झकझोर देने की छमता रखता थे।
तो आइये काव्य-साहित्य को उसकी विभिन्न परम्पराओं में महसूस करें। विभिन्न रसों से लाबलाब्ब इस रस-शाला "वो पल" का द्वार आप सबके लिया खुला है और मैं इस बाग़ का माली (सर्वेश त्रिपाठी) दोनों हाथों से आपका स्वागत एवं आह्वान करता हूँ।
एक इंजीनियरिंग छात्र के तौर पर मेरा मानना है कि तकनीक का प्रयोग भाषा एवं साहित्य के स्तर पर भी होना चाहिए,ताकि साहित्य कि ये विधा अपने तकनिकी रूप में सुशोभित हो सके । फलतः किसी भी कार्य के तकनिकी पहलुओं को ध्यान में रख कर ही सटीकता को प्राप्त किया जा सकता है।

आपका - सर्वेश त्रिपाठी"काव्य".

Wednesday, August 27, 2008

पुराने पन्ने.



कुछ पन्ने बड़े पुराने,
आज अचानक हाथ लगे,
तासीर आज भी ताजी थी,
बचपन में लिखे उन गीतों की,
गलतियाँ बड़ी निकली उनमें,
स्वाद और भी पाया उनमें।

तब के ख़ुद पर इतना ,
ज़ोर ज़ोर से हसना आया,
ख़ुद की गलती का सुधारक,
एक उम्र बाद जो बन आया,
नन्हे मन की परख भी देखी,
भींगी आँखें नही थी सूखी।

उल्लास पूरित मन एक पाया,
जब मैंने वो गाना गाया,
सुर उसके आज भी याद थे,
हाथों ने बरबस ताल भी ठोका,
महफ़िल सजी बिन लोगों के,
ख़ुद को कौन है देता धोखा।

विषय बड़ा दिलचस्प था निकला,
भूत में जिसने मुझको धकेला,
परत डर परत उधेरती गई,
छोटी छोटी यादों की कलि,
आदे तिरछे लिखा था सब कुछ,
हाँ! लिखावट पहले से सुधर गई.

Monday, June 23, 2008

वजूद.


कौन हूँ मैं,मैं हूँ किसका,
ठौर ठिकाना पता न जिसका,
किस डगर पर,किस मंजिल का,
इस गर्दिश में अश्क है किसका।

हूँ किस किस की सोच,
कहाँ मेरा साया है जाता,
मैं औरों को कहा जानू,
ख़ुद को भी कैसे पाता?


दूर कहाँ देखा करता हूँ,
कौन वहाँ दिखता है मुझको,
वजूद बयां भी है क्या उसका,
क्यूँ धुंधला सा दिखता मुझको?


राह कठिन है दूर चला चल,
क्यूँ थक सा तू जाता है,
मंजिल भी पीछे दौड़ पड़ेगी,
देखें कब रहें नई बनाता है?

बचपन मत छीनो




ए वक्त!मुझसे मेरा बचपन मत छीनो।

फ़िर दिन का उजाला भर जाए,

सुना आँगन फ़िर खिलखिलाए,

बगिया अपनों से सजती हो तो,

जीने का मज़ा भी आ जाए।

यूँ रात का आँचल गहराए,

सो शाम की लाली खोने दो।

ए वक्त!मुझसे मेरा बचपन मत छीनो।



याद मुझे इक बात हुई थी,

घनघोर अँधेरी रात हुई थी,

रहे हम सोये सपनो में खोये,

इक श्वेत परी से बात हुई थी,

सपनो का राग ही बदल गया,

मुझे उसी रात में सोने दो।

ए वक्त!मुझसे मेरा बचपन मत छीनो।


सच क्या है क्या होता जूठ,

जो कुछ देखा,जो कुछ पाया,

झट हमने सबको बताया,
रही नही जब किसी की काया,
इस पर कब मैं पछताया,
बातों की काया बदल न दो।

ए वक्त!मुझसे मेरा बचपन मत छीनो।


प्रथम गुरु जो माँ है मेरी,

जिसने मुझे चल संसार दिखाया,

उसके आँचल में आनंद लहर थी,

सत संस्कारों से लैस कराया,

वही आदि है,वही अंत है,

फ़िर उसी गुरु संग पढने दो।

ए वक्त!मुझसे मेरा बचपन मत छीनो।

बिता बचपन,बदली कया,

जाने कहा समय ले आया,

नए रही जब साथ मिले,

नई नवेली बात बढ़ी,

बातों की सौगात बढ़ी,

बातों की काया बदल न दो।

ए वक्त!मुझसे मेरा बचपन मत छीनो।